घुमक्कड़ जिसने इंतज़ार किया - आवरण

घुमक्कड़ जिसने इंतज़ार किया

सब्र की एक छोटी कहानी

घुमक्कड़ जिसने इंतज़ार किया

नन्हा घुमक्कड़ हमेशा जल्दी में रहता था। वह सूरज को पूरा उगने से पहले ही दौड़कर आगे निकल जाता।

"जल्दी, जल्दी," वह बुदबुदाता। "देखने को कितना कुछ है।" पर उसके पैर कभी ज़मीन को नहीं देखते थे।

एक सुबह रास्ते में एक छोटा-सा भूरा बीज पड़ा था। "तुम क्या बनोगे?" उसने पूछा। बीज कुछ नहीं बोला।

उसने उसे नरम मिट्टी में दबा दिया। "उग जाओ, प्लीज़," वह बोला। "अभी उग जाओ तो अच्छा हो।"

कुछ नहीं हुआ। उसने पैर थपथपाया। उसने एक बहुत लंबी साँस छोड़ी।

उसने मिट्टी में झाँका। अब भी कुछ नहीं। पर अँधेरे में नीचे नन्हीं जड़ें धीरे-धीरे फैल रही थीं।

तो वह किसी तेज़ चीज़ की तलाश में दौड़ पड़ा।

काई लगे एक पत्थर पर से एक घोंघा गुज़र रहा था। धीरे, धीरे, धीरे। "क्या तुम थोड़ा तेज़ नहीं चल सकतीं?" घुमक्कड़ ने पूछा।

घोंघा मुस्कुराई। "मैं पहुँच जाती हूँ," उसने कहा। "और रास्ते में सब कुछ देखती भी हूँ।"

घुमक्कड़ ने उसकी तरह चलने की कोशिश की। एक कदम। फिर एक और। उसके पैर कुलबुलाने लगे। ऐसा लगा जैसे बहुत देर हो गई।

तभी उसने देखा: पत्ते पर ओस की बूँद, एक लेडीबग, हरी-हरी नरम काई। वे सब वहीं थे, हमेशा से।

एक मकड़ी अपना जाला एक-एक धागा करके बुन रही थी। उसने जल्दी नहीं की। राही देखता रहा, और उसने भी जल्दी नहीं की।

दोपहर लंबी और सुनहरी हो चली। वह घोंघे के पास बैठ गया, और इस बार हिला तक नहीं।

सूरज डूबने लगा। "जल्दी करो, सूर्यास्त," वह बोला। पर सूर्यास्त ने जल्दी नहीं की।

गुलाबी रंग पिघलकर नारंगी हुआ। नारंगी पिघलकर सुनहरा। हर रंग ने अपनी बारी का इंतज़ार किया।

चाँद आसमान पर एक-एक छोटा कदम चढ़ता गया। वह कभी भागा नहीं। फिर भी हमेशा पहुँच गया।

"ओह," घुमक्कड़ ने साँस भरी। "कुछ चीज़ों को जल्दी नहीं कराया जा सकता।"

एक-एक करके तारे निकल आए। वह घास में सो गया, और घोंघा पहरा देती रही।

रात लंबी और शांत थी। सुबह धीरे-धीरे, कोमलता से आई, हर तिनके पर ओस लिए।

पास ही एक फूल की कली पंखुड़ियाँ कसकर समेटे बैठी थी। "अभी नहीं," जैसे वह कह रही हो। राही मुस्कुराया। "मैं इंतज़ार करूँगा।"

वह उस छोटे-से मिट्टी के टुकड़े की ओर लौटा, इस बार धीरे-धीरे। अब वह ज़रा भी नाराज़ नहीं था।

"मैं इंतज़ार कर सकता हूँ," उसने कहा। और ठीक तभी मिट्टी से एक नन्हा हरा अंकुर बाहर निकला।

वह दो छोटी पत्तियों में खुल गया, जैसे दो हाथ "नमस्ते" कह रहे हों। "तो तुम यहाँ हो," उसने फुसफुसाकर कहा।

अच्छी चीज़ें अपने ही समय पर आती हैं। और नन्हा घुमक्कड़ खुश था कि उसने इंतज़ार किया। समाप्त।