घुमक्कड़ जिसने बाँटा - आवरण

घुमक्कड़ जिसने बाँटा

रोशनी बाँटने की एक छोटी कहानी

घुमक्कड़ जिसने बाँटा

नन्हा घुमक्कड़ अपनी हथेलियों में एक छोटी-सी रोशनी लिए चलता था। वह गरम और सुनहरी जल रही थी।

"अगर मैंने इसे दे दिया, तो शायद खो दूँगा," उसने सोचा। इसलिए उसने उसे अपने पास ही रखा।

जब हवा चली, तो उसने उसे अपने मफ़लर के नीचे छिपा लिया। हवा भी उसे नहीं ले जा सकती थी।

एक तितली देखने पास आई। उसने हथेलियाँ बंद कर लीं और मुँह फेर लिया।

एक नन्हा पंछी डाल पर काँप रहा था। राही ने उसे देखा, पर मुँह फेर लिया और अपनी रोशनी और पास कर ली।

रोशनी उसे गरमाहट देती थी। पर वह अकेला चल रहा था, बस अपने ही कदमों की आहट के साथ।

शाम हो गई। रास्ता धुँधला पड़ने लगा, और जंगल नीला हो गया।

रास्ते के किनारे, एक बड़े पुराने पेड़ के नीचे, कोई बिल्कुल चुपचाप बैठा था, अँधेरे में।

"नमस्ते," घुमक्कड़ ने कहा। "नमस्ते," एक छोटी आवाज़ बोली। "मेरी लालटेन बुझ गई।"

घुमक्कड़ ने अपनी रोशनी को देखा। फिर काँपती हुई नन्ही लोमड़ी को। उसके हाथों ने उसे और कसकर पकड़ लिया।

नन्ही लोमड़ी ने अपनी लालटेन थामी हुई थी। वह ठंडी और अँधेरी थी। उसने एक शब्द नहीं कहा। बस उम्मीद रखी।

"अगर मैंने इसे बाँटा, तो मेरी रोशनी घट सकती है," उसने सोचा। उसका दिल भारी हो गया।

लोमड़ी ने कुछ माँगा नहीं। उसने बस ऊपर देखा, बड़ी-बड़ी उम्मीद भरी आँखों से।

तो धीरे-धीरे घुमक्कड़ ने अपनी हथेलियाँ खोल दीं। उसने अपनी रोशनी आगे बढ़ा दी।

छुआ। नन्ही लालटेन जाग उठी। गरम और सुनहरी, वह जगमगा उठी।

और घुमक्कड़ की अपनी रोशनी? वह ज़रा भी नहीं घटी थी। वह तो और चमकीली हो गई थी।

"ऐसा कैसे हो सकता है?" वह फुसफुसाया। "रोशनी का स्वभाव ही ऐसा है," लोमड़ी बोली।

वे साथ-साथ चल पड़े, दो नन्ही रोशनियाँ, और अँधेरा रास्ता मेहरबान हो गया।

रास्ते में एक ऊँघते साही की लालटेन भी बुझ गई थी। राही ने अपनी रोशनी से उसे छुआ, और वह जाग उठी।

एक खरगोश अँधेरे में बैठा था। एक उल्लू अँधेरे में बैठा था। एक घोंघा भी। एक-एक करके वे सब रोशन हो गए।

हर रोशनी ने दूसरी को जलाया, फिर तीसरी को। जल्दी ही पूरी पहाड़ी जगमगाने लगी।

पहाड़ी के नीचे एक शांत तालाब ने सारी रोशनियाँ समेट लीं, जैसे दूसरा आसमान हो। राही मुस्कुराया। अब हर तरफ़ रोशनी थी।

उस रात वह खिड़की के पास आराम से बैठा, जगमगाता हुआ। जितना उसने दिया, उतना ही ज़्यादा उसके पास हुआ।

अगली सुबह वह खुले हाथों से चला। उसने अपनी रोशनी बाँटी थी। और उसकी दुनिया पहले से ज़्यादा गरम लग रही थी। समाप्त।