
ध्यान से सुनने की एक छोटी कहानी
नन्हा घुमक्कड़ चलता रहा, चलता रहा। वह जहाँ भी गया, दुनिया बोल रही थी।
घंटियाँ टन-टन बजीं। पहिए खड़-खड़ करते चले। पूरा कस्बा गुनगुना और भिनभिना रहा था।
"कितना शोर है," वह बोला। "मुझे तो कुछ भी सुनाई नहीं देता।"
तो वह अपनी ही ऊँची धुन गुनगुनाता हुआ और भी तेज़ चलने लगा।
एक खरगोश उसे कुछ बताना चाहता था। पर घुमक्कड़ जल्दी में आगे बढ़ गया, सुनने की फ़ुरसत ही नहीं थी।
फिर रास्ता नरम और शांत हो गया। घुमक्कड़ रुक गया।
वह काई लगे एक पत्थर पर बैठ गया। उसने आँखें बंद कर लीं।
सबसे पहले उसे अपनी साँस सुनाई दी। अंदर। और बाहर। किसी नींद में डूबे बादल जितनी हल्की।
एक पत्ता धीरे-धीरे नीचे आया। चरर-मरर। गिरने की भी अपनी आवाज़ थी।
फिर बारिश आई। टिप। टिप। टप। उसने एक बूँद अपनी हथेली पर थाम ली।
बारिश के नीचे उसे एक नन्ही चिड़िया का गीत सुनाई दिया।
ऊँचे पेड़ पर एक कठफोड़वा ठक, ठक, ठक कर रहा था। जैसे कोई सुप्रभात कहने के लिए दरवाज़ा खटखटा रहा हो।
"तुम तो यहीं थीं, हमेशा से," वह फुसफुसाया। चिड़िया थोड़ा और ऊँचे सुर में गाने लगी।
हवा ऊँची घास में से गुज़री। श्श्श, उसने कहा। श्श्श। सब ठीक है।
एक नन्हा झरना कंकड़ों पर खिलखिला रहा था। गुल-गुल-गुल। राही ने कान पर हाथ रख लिया।
खरगोश लौट आया। "मैं तुम्हें कुछ बताना चाहता था," उसने कहा। "अब मैं सुन रहा हूँ," घुमक्कड़ बोला।
उसने एक-एक शब्द सुना और कुछ भी नहीं कहा। उसने जाना कि सुनना भी गले लगाने जैसा है।
शाम ढले दूर कहीं घंटियाँ बजने लगीं। गाँव से एक दूर का गीत तैरता हुआ आया।
झींगुर गाने लगे। एक उल्लू बोला, हू। हू। शुभ रात्रि।
तालाब के पास एक मेंढक ने टर्र कहा। फिर दूसरे मेंढक ने जवाब दिया। वे आपस में बातें कर रहे थे, और राही को सुनकर अच्छा लगा।
तारे बिल्कुल आवाज़ नहीं करते थे। फिर भी उसने उन्हें सुना, अपने पूरे दिल से।
उस रात वह सबसे कोमल आवाज़ सुनते-सुनते सो गया। अपनी ही धड़कन। धक। धक।
अगली सुबह वह थोड़ा धीरे चला, टोपी पीछे सरकाए। खरगोश उसके साथ-साथ चला।
दुनिया अब भी शोर से भरी थी। पर अब वह जानता था कि शांति कहाँ रहती है, और उसे कैसे सुना जाता है। समाप्त।